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पक्षियों में भी होती है गाना गाकर अपनी ओर आकर्षित करने की कला,  नर कोयल जो फीमेल कोयल को रिझाने के लिए गाता है कुहू कुहू कुहू गाना 

 

वर्षा ऋतु के समाप्त होते-होते कोयल की मधुर वाणी पर भी विराम लग गया l उसने अपनी वाणी की सार्थकता सिद्ध कर दी यानी अपने मधुर गान से काला रंग के नर कोयल ने चितकबरी रंग की मादा कोयल को प्रणय के लिए रिझाया और फिर अंडा देने के लिए अपने पार्टनर को कौवे के घोंसले की राह दिखा दी कि वहां जाकर अंडा दे आओ l

गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार के पूर्व प्रोफेसर व अंतर्राष्ट्रीय पक्षी वैज्ञानिक डॉ दिनेश चंद्र भट्ट ,जो अभी भी पक्षियों और मानव वन्य जीवन संघर्ष संबंधित विषयों पर शोध कार्य कर रहे हैं, ने बताया कि न केवल कोयल अपितु अन्य पक्षी जैसे काफल पको, हिमालय कुकू चातक ,पपीहा इत्यादि ने भी अपना गायन जैसे” पी कहां ..पी कहां.. पी कहां ” और “काफल पाको …काफल पाको “..को बंद कर दिए हैं क्योंकि इनका प्रजनन का कार्य संपूर्ण हो चुका है I गाने की ऐसी व्यावहारिक और वैज्ञानिक उपयोगिता की चालाकी भरी कहानी बहुत ही कम पक्षियों में मिलती है l

डॉ भट्ट ने बताया कि मनुष्य में गाने का प्रचलन और उसकी उपयोगिता न जाने कितनी सभ्यताओं के बाद विकसित हुई होगी किंतु प्रकृति ने पक्षी वर्ग को प्रणय गायन यानी लव सोंग का वरदान मनुष्य के विकास से लाखों वर्ष पूर्व ही दे दिया था l भारतीय कवियों ने भी पक्षियों के गाने के बारे में अपने साहित्य में अनेक चर्चाएं की हैं और कोयल के लिए कहा गया है कि वह अपने प्रेमी के वियोग में ग्रीष्म ऋतु में गाना गाते गाते काली हो गई है.।

 

 

कौवे के घोसले में बड़े साइज में कोयल का बच्चा दिख रहा है और                           छोटे साइज में कौवे का बच्चा

कोयल ने बनाया कौवे को मूर्ख : बच्चों का लालन पालन कराया

कोयल का गीत जितना लुभावना लगता है ठीक उसके विपरीत इसका कपट पूर्ण ” ब्रुड पैरासाइटिक व्यवहार ” है जिसके अंतर्गत यह कौवा को धोखा देकर उनके घोसले में अपना अंडा दे देती है और इतना ही नहीं अंडों की सिकाई से लेकर बच्चों के लालन-पालन की पूरी खिदमत कौवे से करवाती है l

कोयल के इस विशिष्ट ब्रूड पैरासाइटिक यानी परजीविता व्यवहार( इस व्यवहार के अंतर्गत अपने अंडे और बच्चों का लालन पालन दूसरे पक्षी से कराया जाता है) पर चर्चा करते हुए डॉo भट्ट ने बताया कि उनकी रिसर्च टीम जिसमें उनके पूर्व शोध छात्र अभी भी शामिल है जैसे डॉoविनय कुमार सेठी, डॉo विवेक सक्सेना ,आशीष कुमार ने कौवे के नेस्टिंग बिहेवियर के ऊपर सर्वे किया और पाया कि जब कोयल को अंडे देने होते हैं तो नर व मादा कोयल किसी कौवे के घोंसले के पास टहनी में बैठ जाते हैं l इनकी उपस्थिति से चिढ़कर कौवा (जो अपने अंडे को सेक
ने में व्यस्त रहता है) घोंसला छोड़कर नर कोयल को दौड़ाता है l नर कोयल थोड़ी दूर उड़कर फिर बैठ जाता है l पुनः कौवा उसे दौड़ाता है l इस बीच ,मादा कोयल मौके का फायदा उठाकर कौवे के घोसले में चार-पांच सेकंड में अंडा दे देती है और एक विशेष बोली के संकेत से नर कोयल को संदेश भेजती है कि काम हो गया है ,अब कौवे के पीछे पड़ने की जरूरत नहीं है l

कौवे के घोसले में कौवे के अंडों के साथ कोयल के       अपेक्षाकृत तीन छोटे अंडे भी दिखाई दे रहे हैं

शोध कार्य में पाया गया की मादा कोयल कौवे के घोसले से कौवे के एक अंडे को नीचे गिरा देती है और फिर अपना अंडा उसमें दे देती है l कोयल का अंडा अपेक्षाकृत छोटा होता है किंतु रंग रूप में काफी कुछ कौवे के अंडे से मिलता जुलता है और इस प्रकार एक कोयल किसी कौवे के घोसले में तीन से चार अंडे तक दे देती है और हर बार कौवे के एक अंडे को नीचे गिरा देती है l और भी विचित्र बात यह है की कोयल का बच्चा कौवे के बच्चे से पहले ही अंडे से बाहर निकल आता है और बार-बार खाना मांग कर कौवे के बच्चे से बड़ा हो जाता हैl कौवा प्रतिदिन कोयल के बच्चों के मुंह में खाना देता रहता है l एक समय ऐसा आता है जब कोयल का बच्चा अपनी मां के पास चला जाता है और इस तरह कोयल कौवे को मुर्ख बनाकर अपना काम करवा लेती है l

मूल रूप से ग्राम भटगांव पौड़ी गढ़वाल के निवासी डॉ दिनेश चंद्र भट्ट हरिद्वार जिले और पौड़ी गढ़वाल जिले के विभिन्न क्षेत्रों में मानव वन्य जीवन संघर्ष और पक्षी विज्ञान के ऊपर अभी भी शोध कार्य कर रहे हैं l इस स्टडी के आंकड़े डुगड़ा ब्लॉक के कुछ गांव से और हरिद्वार में राजा गार्डन कॉलोनी, गुरुकुल कांगड़ी व पथरी कस्बे से लिए गए हैं l वर्तमान में डॉ भट्ट एशियाई पक्षी विज्ञान एलाइंस के फाउंडर मेंबर है और सिंगापुर में आयोजित होने वाली संगोष्ठी के साइंटिफिक कमेटी के मेंबर है l उन्हें नवंबर माह 2026 में सिंगापुर पक्षी विज्ञान की कॉन्फ्रेंस में लेक्चर देने के लिए आमंत्रित किया गया है l

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