जगजीतपुर, फुटबॉल ग्राउंड में शिवाजी विराट हिंदू सम्मेलन का आयोजन
सनातन धर्म है संसार का सबसे प्राचीन धर्म - रूपेंद्र प्रकाश महाराज

कमल मिश्रा
हरिद्वार। जगजीतपुर, फुटबॉल ग्राउंड हरिद्वार में शिवाजी विराट हिंदू सम्मेलन का आयोजन जगजीतपुर मंडल के हिंदू समाज के द्वारा आयोजित किया गया।जिसमें सैकड़ो की संख्या में पुरुषों महिलाओं बच्चों ने सपरिवार प्रतिभाग किया। सर्वप्रथम हवन पूजन एवं शंख ध्वनि से कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। मुख्य अतिथियों के द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुआत की गई।

मुख्यअतिथि महामंडलेश्वर स्वामी रूपेंद्र प्रकाश महाराज ने कहा कि सनातन धर्म संसार का सबसे प्राचीन धर्म है जिसे शाश्वत सत्य माना जाता है यह केवल एक धार्मिक पढ़ती नहीं बल्कि जीवन जीने की एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक कल है जब हम हिंदू एकता की बात करते हैं तो इसका अर्थ केवल राजनीतिक या सामाजिक जुड़ाव नहीं है बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सूत्र की पहचान है जो आज करोड़ों लोगों को एक साथ बांध के रखे हुए हैं।
सनातन धर्म की विशालता इसकी उदारता में ही निहित है।
आज के बदलते परिवेश में हिंदू एकता की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है एकता का अर्थ जड़ों की रक्षा और सम्मान है।
सनातन धर्म विशाल वट वृक्ष है जिसकी इच्छा में समस्त मानवता को शांति मिल सकती है हिंदू एकता इसी वट वृक्ष की जड़ों को सीखने जैसा है यदि जड़े मजबूत होगी तो धर्म की शाखाएं पूरे विश्व में मानवता शांति और प्रेम का संदेश फलता रहेगी एकता में ही शक्ति और संगठित हिंदू समाज की एक सशक्त भारत और सुरक्षित भविष्य की नींव है।
सनातन स्वाभिमान के रूप में अयोध्या में श्री राम जन्म भूमि पर भव्य राम मंदिर का निर्माण हिन्दू स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में स्थापित हुआ तथा इसी के साथ साथ सोमनाथ मंदिर, उज्जैन स्थित महलोक, बद्री केदार का पुनरुत्थान हम सब हिंदुओं का स्वाभिमान बन गया है।
जब हम बंटे थे तो हमने बहुत कुछ खोया अब समय है एक होने का अपनी जड़ों की ओर लौटने का सनातन केवल धर्म नहीं जीने का ढंग है और एकता ही हमारा सबसे बड़ा अस्त्र है।
एकता का मूल मंत्र संगठन में शक्ति है और सनातन में ही शांति है।
मुख्य वक्ता अनिल मित्तल ने संघ की 100 वर्षों की यात्रा पर प्रकाश डालते हुए बताया कि संघ की स्थापना 27 सितंबर 1925 को नागपुर में डॉ केशव बलिराम हेडगवार द्वारा की गई। उस समय भारत औपनिवेशिक परिस्थिति में था डॉक्टर साहब का मानना था कि भारत की पराधीनता का मुख्य कारण हिंदुओं का बिखराव है।
उन्होंने व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट निर्माण का मंत्र दिया। अपने 100 वर्ष की यात्रा में एक छोटा सा बीज आज एक विशाल वट वृक्ष बन चुका है।
संघ की पहचान केवल वैचारिक संगठन के रूप में नहीं बल्कि दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संस्थान के रूप में है।
संघ के माध्यम से लाखों सेवा कार्य चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो चाहे स्वास्थ्य का क्षेत्र हो चाहे कौशल विकास हो अथवा देश में विभिन्न विभिन्न समय पर आयी आपदाओं ,महामारियों, बाढ़ पीड़ितों की मदद में संघ के स्वयंसेवक अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर समाज में सेवा भाव के माध्यम से काम कर करते हैं।
शताब्दी वर्ष के संकल्प में संघ अब स्वदेशी ,स्वभाषा, स्व संस्कृति की दिशा पर जोर दे रहा है।
विशिष्ट अतिथि ममता डोबरियाल ने समाज में चल रहे पंच परिवर्तन के विषय को लेकर कहा कि परिवार के माध्यम से समाज और राष्ट्र में सकारात्मक बदलाव लाना है यदि हम अपने परिवार के भीतर पांच बुनियादी सुधार कर ले तो एक आदर्श समाज का निर्माण स्वयं हो जाएगा।
पंच परिवर्तन के विषय में बताते हुए उन्होंने कहा कि हमें अपने देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए विदेशी ब्रांड के बजाय स्वदेशी बिकल्पों का चुनाव करना होगा।
प्रदूषण कम कर आने वाली पीढ़ी को एक स्वच्छ वातावरण देने के साथ-साथ प्लास्टिक का उपयोग कम कर जल संरक्षण एवं पेड़ लगाकर पर्यावरण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।
सामाजिक समरसता को अपनाकर जाति धर्म या ऊंच नीच के भेदभाव को समाप्त करना होगा।
कुटुम्भ प्रबोधन में बिखरते हुए परिवारों को बचाना और बच्चों में नैतिक मूल्य डालना तथा पूरे परिवार को एक साथ रहने के संस्कार पुनर्जीवित करने होंगे।
उसी के साथ-साथ नागरिक कर्तव्य के अंतर्गत एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में कर्तव्य का पालन व्यवस्था और अनुशासन के साथ-साथ यातायात नियमों का पालन, स्वच्छता तथा सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना भी हमारा ही कर्तव्य है।
कार्यक्रम का समापन भारत माता की आरती के द्वारा किया गया।
मंच संचालन चित्रा शर्मा के द्वारा किया गया।
कार्यक्रम में बच्चों के द्वारा सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आयोजन किया गया जिसमें प्रमुख रूप से समा , रूही पाल,सृष्टि, परिधि, अवयव सैनी सोनिया, अदिति एवं वर्षा आदि ने प्रतिभाग किया।




