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केदारनाथ घाटी में लीद का मुफ्त निस्तारण कर रही थी पतंजलि, अब इसी काम के लिए 1.50 करोड़ लुटाएगा पर्यटन विभाग, उठे सवाल?

आखिर जब पतंजलि मुफ़्त में कर रही थी निस्तारण तो फिर क्यों लुटाया जा रहा है सरकारी खजाना, इस पर भी उठ रहे हैं सवाल

 

मंदाकिनी नदी लीद गिरने से हो रही प्रदूषित, एनजीटी पहले भी राज्य सरकार को  लगा चुकी है फटकार

देहरादून/रुद्रप्रयाग: केदारनाथ घाटी में पतंजलि बिना किसी सरकारी फंड के खच्चरों की लीद (गोबर) उठाने का काम कर रही थी, लेकिन अचानक बिना किसी पूर्व सूचना के जिला पशुपालन विभाग ने करार रद्द कर दिया और आनन-फानन में पर्यटन विभाग ने लीद निस्तारण का नया ‘पायलट प्रोजेक्ट’ हिमालय इंस्टीट्यूट फॉर इनवायरमेंट इकोलॉजी एंड डेवलपमेंट संस्था को दे दिया। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पर्यटन विभाग इस नए प्रोजेक्ट पर डेढ़ करोड़ रुपये खर्च करने जा रहा है जबकि पतंजलि इसे निशुल्क कर रहा था। ऐसे में सरकारी खजाने के इस इस्तेमाल पर तीखे सवाल उठने लगे हैं। पतंजलि ने हाल ही में इस मामले में रूद्रप्रयाग प्रशासन और पशुपालन विभाग को नोटिस भी भेजा है। हैरानी की बात यह है कि विभागीय कैबिनेट मंत्री सौरभ बहुगुणा भी पूरे प्रकरण से अनजान हैं।

केदारनाथ धाम के पैदल यात्रा मार्ग पर घोड़े-खच्चरों के गोबर (लीद) के निस्तारण का मुद्दा अब एक बड़े विवाद में तब्दील हो गया है। एक ओर इस मामले में पतंजलि और पशुपालन विभाग आमने-सामने आ गए हैं क्योंकि पशुपालन विभाग के साथ पतंजलि के हुए करार को बिना किसी सूचना 2026 में विभाग ने रद्द कर दिया है तो दूसरी ओर पर्यटन विभाग द्वारा इसी प्रोजेक्ट के लिए करोड़ों रुपये के नए पायलट प्रोजेक्ट को लांच करने की तैयारी है, जिससे गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

क्या है मूल समस्या?

केदारनाथ यात्रा सीजन के दौरान हर साल पैदल मार्ग पर 4 से छह हजार के करीब घोड़े-खच्चर संचालित होते हैं। हजारों जानवरों की लीद (गोबर) का सही निस्तारण न होना एक बड़ी चुनौती है।

पर्यावरण और यात्रियों को नुकसान: यह गंदगी न सिर्फ पैदल चलने वाले श्रद्धालुओं के लिए भारी परेशानी का सबब बनती है, बल्कि पर्यावरण के लिए भी गंभीर खतरा है।

एनजीटी की सख्त चेतावनी: नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) राज्य सरकार और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को कई बार फटकार लगा चुका है। एनजीटी के अनुसार, इस गोबर के कारण पवित्र मंदाकिनी नदी प्रदूषित हो रही है, जिससे जलीय जीवों के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है और नदी की शुद्धता खत्म हो रही है।

पतंजलि के साथ करार और रद्दीकरण

इस पर्यावरणीय संकट से निपटने के लिए वर्ष 2024 में पशुपालन विभाग ने ‘पतंजलि’ के साथ एक अनुबंध किया था। पतंजलि बिना किसी सरकारी खर्च के, अपने संसाधनों से इस लीद का निस्तारण कर रही थी। लेकिन, अप्रैल 2026 में पशुपालन विभाग ने यह कहते हुए अचानक अनुबंध समाप्त कर दिया कि पतंजलि का काम ठीक नहीं है। जबकि हिमालयन कंपनी को फरवरी में ही काम सौंप दिया गया था।

पतंजलि ने भेजा नोटिस 

अचानक हुई इस कार्रवाई से नाराज पतंजलि ने पशुपालन विभाग को नोटिस थमा दिया है। पतंजलि के प्रमुख दावे इस प्रकार हैं। पतंजलि इस प्रोजेक्ट पर अब तक लगभग 40 लाख रुपये से अधिक खर्च कर चुकी है। अनुबंध की शर्तों के अनुसार, पशुपालन विभाग को कोई भी एकतरफा फैसला लेने से पहले संस्था का पक्ष सुनना चाहिए था और सुधार के लिए 90 दिन का समय (नोटिस पीरियड) देना चाहिए था, जिसका पालन नहीं किया गया। इधर, अनुबंध बहाल नहीं होने की सूरत में पतंजलि ने सख्त कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी है।

बिना 90 दिन का इंतजार किए अनुबंध खत्म करने के बाद पशुपालन विभाग खुद कानूनी पचड़े में फंसता नजर आ रहा है। वहीं, राज्य के पशुपालन मंत्री सौरभ बहुगुणा का कहना है कि इस मामले की उन्हें कोई जानकारी नहीं है। कहा कि यदि कुछ ऐसा है तो पूरे प्रकरण की जांच कराई जाएगी।

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