दधीचि देहदान समिति (रजि•) का तृतीय वार्षिक उत्सव एवं महर्षि दधीचि स्मृति यज्ञ श्रद्धा एवं संकल्प के साथ संपन्न
नेत्रदान, अंगदान एवं देहदान के संकल्पधारियों तथा दिवंगत दानदाताओं के परिजनों का हुआ सम्मान

कमल मिश्रा
हरिद्वार, 4 अक्टूबर 2026। दधीचि देहदान समिति (रजि.), हरिद्वार द्वारा तृतीय वार्षिक उत्सव एवं महर्षि दधीचि स्मृति यज्ञ का आयोजन रविवार को आर्य समाज मंदिर, सेक्टर-1, भेल, हरिद्वार में प्रातः 11 बजे श्रद्धा, सेवा और मानवता के संकल्प के साथ संपन्न हुआ।

कार्यक्रम का शुभारंभ सामूहिक वंदे मातरम् से हुआ। इसके पश्चात अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर भारत माता एवं महर्षि दधीचि के चित्र के समक्ष पुष्पांजलि अर्पित की। इस अवसर पर दिवंगत दानदाताओं को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए उनके परिजनों तथा उपस्थित संकल्पधारियों को नमन किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता महामंडलेश्वर पूज्य स्वामी रूपेंद्र प्रकाश प्राचीन अवधूत मंडल आश्रम, हरिद्वार ने की। उन्होंने अपने आशीर्वचन में कहा कि मनुष्य का जीवन केवल स्वयं के लिए जीने तक सीमित नहीं होना चाहिए। जीवन की वास्तविक सार्थकता तब है, जब हमारे जाने के बाद भी हमारा शरीर, हमारे अंग अथवा हमारी आँखें किसी दूसरे के जीवन में आशा और प्रकाश का कारण बनें। उन्होंने सभी संकल्पधारियों एवं दिवंगत दानदाताओं के परिवारों को आशीर्वाद देते हुए इस पुनीत अभियान को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।
मुख्य वक्ता डॉ. दिनेश चंद्र शास्त्री, प्रोफेसर, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार ने वेदों एवं भारतीय संस्कृति में वर्णित सेवा, त्याग और परोपकार की भावना पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में दान केवल धन देने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने जीवन के पश्चात शरीर एवं अंगों को मानवता के लिए समर्पित करना भी महान सेवा है। डॉ. शास्त्री ने स्वयं भी नेत्रदान एवं देहदान का संकल्प लेने की घोषणा की।
180 से अधिक लोगों ने लिया मानवता की सेवा का संकल्प समिति के अध्यक्ष सुभाष चाँदना ने समिति की वर्षभर की गतिविधियों एवं जागरूकता अभियान का प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए बताया कि दधीचि देहदान समिति द्वारा पिछले वर्षों से लगातार समाज में नेत्रदान, अंगदान एवं देहदान के प्रति जागरूकता का अभियान चलाया जा रहा है। समिति के प्रयासों से अब तक लगभग 180 लोगों ने नेत्रदान, अंगदान एवं देहदान का संकल्प लिया है, जबकि गत एक वर्ष में लगभग 35 नए महानुभावों ने इस पुनीत कार्य के लिए संकल्प लिया।
उन्होंने कहा कि महर्षि दधीचि का जीवन हमें यह संदेश देता है कि देह नश्वर है, लेकिन देह का सदुपयोग मानवता के लिए अमर सेवा बन सकता है। उन्होंने रामचरितमानस के जटायु प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि जटायु ने अपने प्राणों की चिंता किए बिना धर्म और परहित के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। यही भावना आज के समाज में सेवा और परोपकार का आधार बन सकती है।
देहदान से चिकित्सा शिक्षा और शोध को मिलता है अमूल्य सहयोग
कार्यक्रम में डॉ. राजीव चौधरी, एम्स ऋषिकेश ने देहदान के वैज्ञानिक एवं चिकित्सकीय महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि चिकित्सा शिक्षा एवं शोध के क्षेत्र में देहदान का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है। देहदान से प्राप्त शरीर को मेडिकल विद्यार्थियों को मानव शरीर की संरचना का वास्तविक एवं व्यावहारिक अध्ययन करने का अवसर मिलता है। इससे भावी चिकित्सकों की शिक्षा और प्रशिक्षण को मजबूती मिलती है तथा चिकित्सा अनुसंधान में भी सहायता प्राप्त होती है।
उन्होंने समाज में देहदान के प्रति व्याप्त भ्रांतियों को दूर करने की आवश्यकता बताते हुए कहा कि यह एक अत्यंत सम्मानजनक और मानवहितकारी कार्य है। उन्होंने दधीचि देहदान समिति द्वारा चलाए जा रहे जागरूकता अभियान की सराहना की तथा अधिक से अधिक लोगों से नेत्रदान एवं देहदान का संकल्प लेने का आह्वान किया।
दिवंगत दानदाताओं के परिजनों ने साझा किए भावुक अनुभव
कार्यक्रम का सबसे भावुक पक्ष उस समय सामने आया, जब दिवंगत दानदाताओं के परिजनों ने मंच पर अपने अनुभव साझा किए। डॉ. विशाखा तथा श्री बलवीर तलवार जी ने अपने पिता के नेत्रदान के बाद के अनुभव साझा करते हुए बताया कि अपने प्रियजन को खोने का दुःख तो जीवनभर रहता है, लेकिन यह संतोष मन को शक्ति देता है कि उनके जाने के बाद भी उनकी आँखों के माध्यम से किसी अन्य व्यक्ति के जीवन में रोशनी आई।
परिजनों ने कहा कि नेत्रदान केवल आँखों का दान नहीं है, बल्कि किसी अंधेरे जीवन में प्रकाश देने का संकल्प है। उन्होंने समाज के लोगों से भावनात्मक संकोच और भ्रांतियों से ऊपर उठकर नेत्रदान, अंगदान एवं देहदान के लिए आगे आने की अपील की।
संकल्पधारियों और दानदाताओं के परिवारों का सम्मान
समारोह में नेत्रदान, अंगदान एवं देहदान के लिए संकल्पित महानुभावों तथा दिवंगत दानदाताओं के परिजनों का सम्मान किया गया। सम्मान प्राप्त करने वाले परिवारों ने कहा कि यह सम्मान केवल उनका नहीं, बल्कि उन दिवंगत परिजनों के मानवीय संकल्प का सम्मान है, जिन्होंने अपने जीवन के बाद भी समाज के लिए कुछ छोड़ जाने की प्रेरणा दी।
कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने महर्षि दधीचि के त्याग, तपस्या और परोपकार को स्मरण करते हुए मानवता की सेवा के इस अभियान को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।
एक संकल्प किसी के जीवन में नई रोशनी ला सकता है
समिति ने समाज से अपील करते हुए कहा कि नेत्रदान, अंगदान एवं देहदान के लिए संकल्प लेना मृत्यु के बारे में सोचना नहीं, बल्कि जीवन के बाद भी मानवता के काम आने की तैयारी करना है। आज हमारे बीच ऐसे अनेक लोग हैं, जिन्हें किसी के नेत्रों से दृष्टि, किसी अंग से जीवन और देहदान से चिकित्सा शिक्षा का लाभ मिल सकता है।
समिति का आग्रह है कि परिवार में कम से कम एक व्यक्ति आगे आए और नेत्रदान, अंगदान अथवा देहदान का संकल्प ले। अपने परिवारजनों को भी इस संकल्प की जानकारी दें, ताकि आवश्यकता के समय परिवार उस संकल्प को पूरा करने में सहयोग कर सके।
यदि हमारे जाने के बाद हमारी आँखें किसी को दुनिया दिखा सकें, हमारे अंग किसी को जीवन दे सकें और हमारा शरीर किसी भावी चिकित्सक की शिक्षा में काम आ सके, तो इससे बड़ा परोपकार और क्या हो सकता है?
कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ। समिति की ओर से सभी अतिथियों, संकल्पधारियों, दानदाताओं के परिजनों एवं उपस्थित नागरिकों का हृदय से आभार व्यक्त किया गया।
दधीचि देहदान समिति का संदेश
“परहित सरस धर्म नहीं भाई।”
जीते जी रक्तदान — मरणोपरांत नेत्रदान, अंगदान एवं देहदान।
आइए, अपने जीवन को सेवा का संकल्प दें और आज ही नेत्रदान, अंगदान अथवा देहदान का संकल्प लें।
दधीचि देहदान समिति (रजि.), हरिद्वार
संपर्क सूत्र: 9410326582, 9411111675, 9410395622, 9927205993
“महर्षि दधीचि केवल एक ऋषि नहीं, एक विचारधारा हैं—त्याग, तपस्या और मानवता के लिए सर्वस्व समर्पण की विचारधारा।”




