डॉ0 हरिनारायण जोशी अंजान
हरिद्वार। चुनाव जीतकर आए विरोधी पक्ष के नेता रामलाल ने मुख्यमंत्री का गला इसलिए पकड़ दिया कि वे दल बदल करवा रहे थे दूसरे दिन वही रामलाल उन्हीं की कैबिनेट में मंत्री पद की शपथ ले रहे थे। इस प्रक्रिया ने भारतीय राजनीति को आया राम गया राम का दर्शन दिया। और लगभग हर राजनेता यही राजनीति कर रहा है। आजकल तो चारों ओर वोट चोरी का बड़ा शोर है।
आश्चर्य कि जिनका राज ही जंगल राज कहलाता था और वहां के टॉपर अपने विषय तक नहीं बतला पाते थे। नौकरियां किस तरह से बिकती थीं। उनके राज में तब वोटों का क्या होता रहा होगा? लेकिन वे भी कहते हैं कि अब वोट चोरी हो रहे हैं। एक नेता जी के राज में तो खुली नकल की तक छूट थी और अपराधों के ग्राफ की ऊंचाई का तो पता ही नहीं। वह भी अब वोट चोरी की मासूमियत सी बात करते हैं। और उनकी कहानी तो बड़ी अजब गजब भी है। बेशुमार दौलत की गणना नहीं है। एक ही महोत्सव में एक दो ठुमका लगाने के ही 8 करोड़ तक पेमेंट कर देते थे। ऊपर से वे पिछड़े हैं और पत्रकारों को तक उनकी जाति पूछते रहते हैं कि तुम तो सवर्ण जाति के हो उच्च जाति के हो तुमसे क्या आशा करना। भले ही अपने घर के सिंहासन पर पहाड़ के अभिजात्य वर्ग उच्च कुलीन ठाकुरों की बेटी जो नाक पर मक्खी भी न बैठने दें, आरूढ़ हैं। और राजनीति पीडीए की करो लेकिन बस यह कि जनता को मूर्ख समझो जितना झूठ हो सकता है बोलो। जितना अफवाहें फैला सकते हो फैलाओ।
एक पुरातन ऐतिहासिक पार्टी है। वह संसद में 400 से अधिक सांसदों के साथ पहुंचते हैं। पूरे 85 सांसदों वाले प्रदेश में मात्र एक चौधरी चरण सिंह और दक्षिण में एनटी रामाराव की तेलुगू देसम ही कुछ टक्कर दे सकी थी लेकिन तब कोई वोट चोरी का सवाल नहीं था। हां वोट चोरी तो छोटा शब्द भी था। तब अनेक राज्यों में और उनके क्षत्रपों द्वारा पोषित माफियाओं के नाम सुना करते थे जो वोट चोरी नहीं बल्कि पूरा बूथ चोरी/ बूथ कैपचरिंग को अंजाम देते थे। अंग्रेजों के शासन में सूर्य ना छुपने की कहावत भी इस पुरातन पार्टी के राज तक भी चलती रही । इसलिए संविधान में कितने संशोधन हुए, ये किसने किये और मूल संविधान की किताब से प्रतिमान देवी देवताओं के चित्र कब हटाए, किसने हटाए उनका न किसी को कोई मलाल है ना कहीं उसका कोई जिक्र है।
बस फ़िक्र है तो हल्ला मचाने की। मचाते रहो मचाते रहो और मचाते रहो। कोई काम ना अपने आप करो ना सरकार को करने दो। एक दूसरी बड़ी कैडर आधारित नाम की पार्टी है वह कभी दो या तीन पर ही संतोष कर लेती थी। अब उसका भी यही किस्सा है कि इस दल से आ जाओ चाहे उस दल से आ जाओ कोई निर्दल है तो वह भी आ जाओ। बस आ जाओ और साफ सुथरे हो जाओ।
अब राजनीति का मतलब केवल हल्ला गुल्ला धरना प्रदर्शन शोर शराबा ही नहीं है बल्कि थोक में गालियों की बरसात भी है। तो गाली देने वाले समझते रहो तुम्हारी भविष्य की पीढ़ियां काम जो कुछ भी करें लेकिन गालियों की खान हो जाएगी। और जनता को तो ऐसे लोकतंत्र के बारे में सोचना ही पड़ेगा कि इस तरह की सत्ताएं लोक कल्याण का कार्य कैसे करेंगी और किस तरह करेंगी। जब पूरे आचरण विषाक्त हैं तो कार्य की फैसलें सारी विषैली ही पैदा होंगी। जनता तुम समझो और राजनीतिज्ञों तुम सभंलो।
डॉ0 हरिनारायण जोशी अंजान


