हरिद्वार

देसंविवि में दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का सफल समापन

दुनिया की समस्त परिष्कृत भाषाओं में प्राचीनतम भाषा है संस्कृत - डॉ पण्ड्या

कमल मिश्रा

हरिद्वार ।

देवसंस्कृति विश्वविद्यालय में चल रहे भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत भाषा वैज्ञानिक पक्ष और तकनीकी शब्दावली शीर्षक पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का सफल समापन हो गया। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय (उच्चतर शिक्षा विभाग) एवं देवसंस्कृति विवि के संयुक्त तत्वावधान में हुए इस सम्मेलन में उत्तराखण्ड, दिल्ली, बिहार सहित कई राज्यों के शिक्षाविदों ने प्रतिभाग किया। कुल चार तकनीकी व्याख्यान सत्र हुए, जिसमें वक्ताओं ने समृद्धशाली संस्कृत की महत्ता पर डाला। इस दौरान १५ शोधपत्र पढ़े गये, इसमें शोधार्थियों द्वारा संस्कृत के विस्तार एवं आवश्यकता पर विस्तृत जानकारी दी गयी। शिक्षाविदों ने एकमत से स्वीकार किया कि सनातन संस्कृति की पहचान संस्कृत भाषा से जुड़ा हुआ है, संस्कृत भाषा के विकास के साथ ही सनातन संस्कृति का भी विकास होगा।

समापन अवसर पर विख्यात शिक्षाविद एवं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि पूरी दुनिया की समस्त परिष्कृत भाषाओं में प्राचीनतम भाषा है संस्कृत। यह संसार भर का समस्त भाषाओं में वैदिक तथा अन्य महान साहित्य के कारण श्रेष्ठ है। इसको धार्मिक दृष्टि से देववाणी भी कहा जाता है। संस्कृत दिव्य एवं समृद्ध भाषा है। ऐतिहासिकता की दृष्टि से देखें तो यह दुनिया की सभी भाषाओं की जननी है।

गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो सोमदेव शांताशु ने संस्कृत भाषा का विस्तार करने के लिए सभी का आवाहन किया। कार्यक्रम के समापन अवसर पर डॉ संगीता कुमारी ने सभी का आभार व्यक्त किया।

दो दिन चले इस राष्ट्रीय सम्मेलन में सीएसटीटी शिक्षा मंत्रालय, (नई दिल्ली) के अध्यक्ष प्रो. गिरिश नाथ झा, सीएसटीटी शिक्षा मंत्रालय, (नई दिल्ली) के सहायक निदेशक-  जे एस रावत, प्रो. ओमनाथ बिमाली (नई दिल्ली), उत्तराखण्ड संस्कृत विवि हरिद्वार के कुलपति  दिनेशचन्द्र शास्त्री,  जनार्दन हेगडे-बैंगलुरु, प्रो लक्ष्मी नारायण सिंह (बिहार), डॉ संगीता कुमारी (हरिद्वार), श्री मेघ कल्याणसुन्दरम् (चैन्नई), श्री सुमित कुमार भारती (नई दिल्ली), डॉ सच्चिदानंद सनेही, डॉ सुरेश वर्णवाल (हरिद्वार), डॉ उमाकांत इंदौलिया आदि ने अपने-अपने विचार रखे। सभी ने एकमत से स्वीकार किया कि संस्कृत भाषा की अधिकाधिक विस्तार की आवश्यकता है। कार्यक्रम समापन से पूर्व सभी प्रतिभागियों को प्रशस्ति पत्र आदि भेंटकर सम्मानित किया गया।

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