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जुगनू की संख्या अब विलुप्ति के कगार पर

खेती में उपयोग होने वाले हानिकारक रसायनों से जुगनुओं के लार्वा और अंडे नष्ट हो रहे - प्रो0 दिनेश भट्ट

 

उत्तराखंड उवाच ( कमल मिश्रा)

हरिद्वार। प्रत्येक वर्ष विश्व जुगनू दिवस जुलाई के प्रथम सप्ताह में मनाया जाता है . इस वर्ष यह दिवस चार च और पांच जुलाई 2026 को मनाया जा रहा है l

गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर एवं कुल सचिव तथा प्रसिद्ध पर्यावरण वैज्ञानिक पिछले दो वर्षों से विभिन्न शहरों एवं गांव में जुगनू की संख्या का सर्वे कर रहे हैं l उन्होंने बताया कि जुगनू एक निशाचर कीट है जो रात्रि के समय छोटे-छोटे टिमटिमाते हुए तारे की तरह दिखता है l डॉ दिनेश भट्ट के अनुसार उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के दुगड्डा ब्लॉक के अंतर्गत ग्रामीण भागीदारी के द्वारा 50 गांव का सर्वेक्षण किया गया और पाया गया कि इन गांव में प्रति आवास के आसपास एक से पांच जुगनू देखे गए जबकि करीब तीन चार दशक पूर्व इनकी संख्या प्रति आवास या घर में 100 से अधिक होती थी और इन्हें बच्चे अपनी मुट्ठी में पड़कर एक दूसरे की तरफ फेंकते थे l कोटद्वार और हरिद्वार जैसे शहरों में इनकी संख्या पिछले 2 वर्षों में कहीं भी दर्ज नहीं की गई l

पिछले तीन दशकों में पूरे देश में जुगनुओं की आबादी में लगभग 60% से 90% तक की भारी गिरावट देखी गई है। कृत्रिम प्रकाश और शहरों की चकाचौंध के कारण इन्हें प्रजनन साथी खोजने में कठिनाई होती है। जिस कारण यह कीट प्रजनन नहीं कर पाते हैं और संतान की उत्पत्ति नहीं हो पाती है

डॉ दिनेश चंद्र भट्ट ने बताया कि जुगनू के पेट के निचले हिस्से में एक विशेष अंग होता है, जहाँ ‘लूसिफ़ेरिन’ नामक रसायन और ‘लूसिफ़ेरेज’ एंजाइम होते हैं。 ऑक्सीजन के साथ प्रतिक्रिया करने पर यह प्रकाश उत्पन्न करता है, जिसे कोल्ड लाइट कहा जाता है।

नर और मादा जुगनू एक-दूसरे को आकर्षित करने के लिए एक विशेष पैटर्न में चमकते हैं l

कई प्रजातियों के जुगनू चमक कर शिकारियों को चेतावनी देते हैं I

डॉ दिनेश भट्ट के अनुसार के अनुसार, जुगनू स्वस्थ और नम पारिस्थितिकी तंत्र के प्रमुख संकेतक होते हैं।

वैज्ञानिक अध्ययनों ने दुनिया भर में जुगनू की घटती आबादी पर गंभीर चिंता व्यक्त की है l

शहरों की कृत्रिम रोशनी जुगनुओं के प्रजनन चक्र को बाधित करती है, क्योंकि वे अंधेरे में ही चमक कर अपने साथी को खोज पाते हैं।

खेती में उपयोग होने वाले हानिकारक रसायनों से जुगनुओं के लार्वा और अंडे नष्ट हो रहे

भारत में जुगनुओं की पहली राष्ट्रीय सूची में लगभग 92 प्रजातियां दर्ज की गई हैं, जिनमें से 60 से 90%% स्थानिक प्रजातियों पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। शोधकर्ताओं का सुझाव है कि बाहरी कृत्रिम लाइटों (विशेष रूप से LED) को रात में बंद या कम करके, प्राकृतिक आवासों को संरक्षित करके और जैविक खेती को बढ़ावा देकर जुगनुओं को बचाया जा सकता है l

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