हरिद्वार

स्वस्थ,पौष्टिक भोजन को बढ़ावा देता गढ़भोज :श्रीमहन्त डॉ. रविन्द्र पुरी

पारंपरिक खान-पान में छिपा है उत्तराखंड का ज्ञान-विज्ञान: प्रो दिनेश चन्द्र शास्त्री

 

स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता को जोड़ने वाला अभियान हैं गढ़भोज: प्रो. बत्रा

पारंपरिक फसल,व्यंजन, खाद्य विरासत से मजबूत होगी आर्थिकी संदीप रावत

हरिद्वार।
7 अक्टूबर 2026

एस.एम.जे.एन. पी.जी. कॉलेज, हरिद्वार में उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति, पारंपरिक खान-पान एवं स्थानीय अनाजों के संरक्षण और संवर्धन के उद्देश्य से गढ़भोज कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में महाविद्यालय प्रबंधन समिति के अध्यक्ष एवं अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहन्त डॉ. रविन्द्र पुरी जी महाराज मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस अवसर पर उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो दिनेश चन्द्र शास्त्री, वरिष्ठ पत्रकार  संदीप रावत सहित अनेक गणमान्य अतिथि, प्राध्यापकगण, कर्मचारीगण तथा बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।

कार्यक्रम में विद्यार्थियों द्वारा उत्तराखंड के पारंपरिक एवं पौष्टिक व्यंजनों की आकर्षक प्रस्तुति की गई। मंडुवा, झंगोरा, भट्ट, गहत सहित विभिन्न स्थानीय अनाजों एवं दालों से तैयार पारंपरिक व्यंजनों के माध्यम से विद्यार्थियों ने उत्तराखंड की समृद्ध खाद्य संस्कृति और लोकपरंपरा को प्रस्तुत किया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि श्रीमहन्त डॉ रविन्द्र पुरी जी महाराज ने कहा कि उत्तराखंड की पहचान यहां के प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ इसकी समृद्ध लोकसंस्कृति, परंपराओं और पारंपरिक खान-पान से भी है। हमारे पूर्वजों ने स्थानीय जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप ऐसी खाद्य परंपरा विकसित की, जो पौष्टिक होने के साथ-साथ स्वास्थ्यवर्धक भी है।

उन्होंने कहा कि गढ़भोज केवल भोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति, संस्कार और जीवन-पद्धति का प्रतिबिंब है। आज आवश्यकता है कि युवा पीढ़ी आधुनिक जीवनशैली को अपनाते हुए अपनी पारंपरिक विरासत से भी जुड़ी रहे। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे स्थानीय अनाजों एवं पारंपरिक व्यंजनों को अपने जीवन में स्थान दें तथा इनके संरक्षण और प्रचार-प्रसार में सक्रिय भूमिका निभाएं। श्रीमहन्त ने कहा कि स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने से किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

इस अवसर पर उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो दिनेश चन्द्र शास्त्री ने कहा कि भारतीय परंपरा में भोजन को केवल शरीर की आवश्यकता नहीं माना गया, बल्कि इसे स्वस्थ जीवन और संस्कारों का महत्वपूर्ण आधार माना गया है। उत्तराखंड के पारंपरिक खाद्य पदार्थों में स्थानीय ज्ञान-विज्ञान और पीढ़ियों से अर्जित अनुभव समाहित है। उन्होंने कहा कि मंडुवा, झंगोरा, भट्ट और गहत जैसे स्थानीय अनाज एवं दालें हमारी कृषि और खाद्य परंपरा की महत्वपूर्ण धरोहर हैं। इनके संरक्षण का अर्थ केवल पुराने व्यंजनों को बचाना नहीं, बल्कि स्थानीय ज्ञान, कृषि परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना भी है। पूर्व कुलपति ने विद्यार्थियों से कहा कि वे अपनी लोकपरंपराओं का अध्ययन करें और उन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास करें। उन्होंने कहा कि शिक्षण संस्थानों के माध्यम से युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार  संदीप रावत ने कहा कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति केवल लोकगीतों और लोकनृत्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां के पारंपरिक भोजन में भी हमारी पूरी जीवनशैली और सामाजिक इतिहास दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि पहाड़ के पारंपरिक व्यंजन* वहां की भौगोलिक परिस्थितियों, कृषि व्यवस्था और मेहनतकश जीवन का परिणाम हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि आधुनिकता को अपनाना आवश्यक है, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़े रहना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि अपनी मिट्टी, अपने अन्न और अपनी परंपराओं पर गर्व करना ही सांस्कृतिक आत्मविश्वास की पहचान है।*

महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. डॉ. सुनील कुमार बत्रा ने अपने सन्देश में गढ़भोज कार्यक्रम के आयोजन पर महाविद्यालय परिवार, आयोजकों एवं विद्यार्थियों को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत अत्यंत समृद्ध और विविधतापूर्ण है। पारंपरिक खान-पान इस विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि महाविद्यालय का प्रयास है कि विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ-साथ अपनी संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक दायित्वों से भी जोड़ा जाए। गढ़भोज जैसे कार्यक्रम विद्यार्थियों में स्थानीय उत्पादों, पारंपरिक ज्ञान, स्वस्थ जीवनशैली और सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान की भावना विकसित करते हैं। उन्होंने कहा कि गढ़भोज केवल पारंपरिक भोजन का उत्सव नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अस्मिता, संस्कृति, कृषि, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता को जोड़ने वाला अभियान है।

इस अवसर पर विद्यार्थियों ने विभिन्न पारंपरिक व्यंजनों की प्रस्तुति करते हुए उनके निर्माण, स्थानीय महत्व एवं पौष्टिक गुणों की जानकारी दी। अतिथियों ने विद्यार्थियों की प्रस्तुतियों का अवलोकन किया और उनके प्रयासों की सराहना की। इस अवसर पर गढ़भोज में बी. एस. सी. की छात्रा सोनाली, वंशिका तथा माही को संयुक्त रूप से प्रथम पुरस्कार, बी. एस. सी. की संगीता भट्ट, मीनाक्षी, शिल्पी, अंकिता, दिव्यांशी तथा प्रिया को संयुक्त रूप से द्वितीय पुरस्कार, कशिश रावत, नेहा जोशी तथा स्वीटी रानी को संयुक्त रूप से तृतीय पुरस्कार प्राप्त हुआ जबकि बी. ए. की छात्रा ख़ुशी, रिमझिम, नीशू तथा बी. कॉम. की छात्रा आस्था और आयुषी को सांत्वना पुरस्कार प्राप्त हुआ।

कार्यक्रम के अंत में अधिष्ठाता छात्र कल्याण डॉ. संजय माहेश्वरी ने महाविद्यालय परिवार की ओर से सभी अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए संयोजक मंडल की डॉ पूर्णिमा सुन्दरियाल, डॉ गीता शाह, डॉ सरोज शर्मा तथा श्री पंकज भट्ट को भी धन्यवाद दिया। डॉ. संजय माहेश्वरी ने उन विद्यार्थियों की विशेष रूप से सराहना की, जिन्होंने उत्साहपूर्वक पारंपरिक व्यंजनों को तैयार कर उनकी प्रस्तुति की।

डॉ. माहेश्वरी ने कहा कि महाविद्यालय भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति, उत्तराखंड की लोकपरंपराओं, स्वस्थ जीवनशैली और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ने के लिए निरंतर प्रयास करता रहेगा। इस अवसर पर डॉ शिवकुमार चौहान, डॉ मनोज कुमार सोही, डॉ मोना शर्मा, डॉ लता शर्मा, वैभव बत्रा, डॉ विजय शर्मा, डॉ हरीश जोशी, कार्यालय अधीक्षक श्री मोहन चन्द्र पाण्डेय सहित अनेक विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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