सुई-धागे से लिखी सफलता की नई कहानी: उषा सिलाई स्कूल ने बदली आसमा की जिंदगी
श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम (SBMA) एवं आईटीसी मिशन सुनहरा कल द्वारा महिलाओं के लिए वित्तीय साक्षरता प्रशिक्षण का किया आयोजन

कमल मिश्रा
हरिद्वार। श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम (SBMA) एवं आईटीसी मिशन सुनहरा कल द्वारा महिलाओं के लिए वित्तीय साक्षरता प्रशिक्षण आयोजित किया गया। प्रशिक्षण में बचत, बैंकिंग, बीमा और स्वरोजगार से जुड़ी जानकारियां दी गईं। आसमा जी ने भी इसमें भाग लिया और स्वयं सहायता समूह से जुड़ने की इच्छा जताई।

इसके बाद 10 महिलाओं को एकत्रित कर दिनांक 1 जनवरी 2025 को स्वयं सहायता समूह (SHG) का गठन किया गया।
“समूह से जुड़ने के बाद आसमा के जीवन में बदलाव की नई शुरुआत हुई।”

ग्राम सराय की निवासी आसमा, पत्नी साकिब, एक अत्यंत गरीब परिवार से संबंध रखती थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि घर का खर्च चलाना भी मुश्किल हो जाता था। आसमा जी कुछ करना चाहती थीं, लेकिन संसाधनों और अवसरों की कमी उन्हें आगे बढ़ने से रोक रही थी। मन में हौसला था, बस सही अवसर की जरूरत थी। स्वयं सहायता समूह से मिली नई दिशा

उषा सिलाई स्कूल बना सफलता का टर्निंग पॉइंट
समूह से जुड़ने के बाद आसमा जी को उषा सिलाई स्कूल के अंतर्गत सिलाई प्रशिक्षण दिलाया गया। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें आधुनिक सिलाई तकनीकें सिखाई गईं और साथ ही एक सिलाई मशीन भी उपलब्ध कराई गई।
सिलाई मशीन मिलने के बाद आसमा जी ने घर से ही सिलाई कार्य शुरू कर दिया। उन्होंने पूरी मेहनत और लगन से अपने हुनर को निखारा।
“उषा सिलाई स्कूल ने केवल प्रशिक्षण नहीं दिया, बल्कि आत्मविश्वास भी दिया।”
मेहनत रंग लाई — मिलने लगे बड़े ऑर्डर
आसमा के उत्कृष्ट कार्य को देखकर उन्हें हरिद्वार जनपद की मिठाई दुकानों से मिठाई के डिब्बों के कवर सिलने के ऑर्डर मिलने लगे। हाल ही में उन्हें 20,000 मिठाई के डिब्बों के कवर तैयार करने का बड़ा ऑर्डर प्राप्त हुआ है। इस कार्य के लिए उन्हें प्रति पीस 50 पैसे के हिसाब से सिलाई मानदेय मिलेगा।
धीरे-धीरे उनका काम बढ़ता गया और अलग-अलग स्थानों से हजारों रुपये के ऑर्डर मिलने शुरू हो गए। उनकी गुणवत्ता और समय पर कार्य पूरा करने की क्षमता ने उन्हें एक सफल महिला उद्यमी बना दिया।
“छोटे काम से शुरू हुआ सफर आज बड़े ऑर्डरों तक पहुंच चुका है।”
आज बनीं आत्मनिर्भर और सम्मानित महिला
आज आसमा जी प्रतिमाह लगभग ₹10,000 से ₹15,000 तक की आय अर्जित कर रही हैं। उन्होंने न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत की है, बल्कि समाज में भी अपनी अलग पहचान बनाई है। अब परिवार और गांव में उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।
“आर्थिक आत्मनिर्भरता ने आसमा को सम्मान और आत्मविश्वास दोनों दिए जो खुद भी आगे बढ़ीं, अब 10 महिलाओं को भी दे रहीं है रोजगार।
आसमा की सफलता यहीं तक सीमित नहीं रही। आज वे स्वयं के साथ-साथ लगभग 10 अन्य महिलाओं को भी रोजगार प्रदान कर रही हैं। ये महिलाएं अपने-अपने घरों में रहकर सिलाई कार्य कर रही हैं और अपने परिवार की आजीविका चला रही हैं। इस पहल ने गांव की महिलाओं में आत्मनिर्भर बनने की नई प्रेरणा जगाई है।
“एक महिला सशक्त हुई, तो उसके साथ पूरा समुदाय आगे बढ़ने लगा।”
प्रेरणा की मिसाल बनी आसमा की कहानी
आसमा की कहानी यह साबित करती है कि यदि महिलाओं को सही प्रशिक्षण, अवसर और मार्गदर्शन मिले, तो वे अपने जीवन की दिशा बदल सकती हैं। उषा सिलाई स्कूल आज केवल सिलाई सिखाने का माध्यम नहीं, बल्कि महिलाओं के सपनों को आत्मनिर्भरता और सम्मान में बदलने का एक सशक्त अभियान बन चुका है।



