आईआईटी रुड़की में ‘पोषण उत्सव’ का क्षेत्रीय शुभारंभ, पौधारोपण के साथ दिया पर्यावरण एवं पोषण संरक्षण का संदेश

कमल मिश्रा
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की (IIT Roorkee) के Centre for Sustainable Rural Development (CSRD), RCI-Unnat Bharat Abhiyan (RCI-UBA), दीनदयाल रिसर्च इंस्टीट्यूट तथा Indian Nurserymen Association के संयुक्त तत्वावधान में सोमवार को ‘पोषण उत्सव — An Atlas of Cultural Practices Around Nutrition in Bharat’ का क्षेत्रीय शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर पौधारोपण कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया, जिसमें पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के प्रति प्रतिबद्धता का संदेश दिया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत निदेशक आवास (Directors’ Lodge) में पौधारोपण के साथ हुई। पौधारोपण के माध्यम से हरित एवं स्वस्थ पर्यावरण के महत्व को रेखांकित किया गया। इसके बाद ओ.पी. जैन ऑडिटोरियम में कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ हुआ। पंजीकरण के पश्चात दीप प्रज्वलन एवं संस्थान के कुलगीत के साथ समारोह की शुरुआत हुई।
प्रो. कृतिका कोठारी, संयुक्त संकाय, CSRD, IIT रुड़की ने स्वागत संबोधन में सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पोषण केवल भोजन तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि यह हमारी जीवनशैली, स्थानीय परंपराओं, कृषि पद्धतियों और प्रकृति के साथ हमारे संबंधों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। उन्होंने इस पहल को विभिन्न क्षेत्रों की पारंपरिक पोषण प्रथाओं को समझने और उन्हें व्यापक स्तर पर साझा करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
इसके बाद प्रो. आशीष पांडेय, प्रमुख, CSRD, IIT रुड़की ने CSRD और RCI-UBA की गतिविधियों एवं उद्देश्यों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने सतत ग्रामीण विकास के लिए समुदायों की भागीदारी, स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग और स्थानीय ज्ञान के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध पारंपरिक ज्ञान एवं स्थानीय संसाधनों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़कर सतत विकास की दिशा में प्रभावी कार्य किया जा सकता है।
इस अवसर पर Indian Nurserymen Association के महासचिव मुकुल त्यागी ने अपने संबोधन में पौधारोपण और पर्यावरण संरक्षण के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि स्वस्थ समाज और सतत विकास के लिए पर्यावरण का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने पौधों की नर्सरी, वृक्षारोपण और हरित क्षेत्र के विस्तार में सामुदायिक सहभागिता को महत्वपूर्ण बताते हुए प्रकृति के संरक्षण को सामूहिक जिम्मेदारी बताया।
दीनदयाल रिसर्च इंस्टीट्यूट के उपाध्यक्ष श्री अतुल जैन ने अपने संबोधन में ‘An Atlas of Cultural Practices Around Nutrition in Bharat’ के बारे में संक्षिप्त जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह एटलस भारत के विभिन्न क्षेत्रों में पोषण से जुड़ी पारंपरिक एवं सांस्कृतिक प्रथाओं, स्थानीय खाद्य परंपराओं और समुदायों के अनुभवजन्य ज्ञान को एक साथ प्रस्तुत करने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि भारत की विविधता में भोजन और पोषण की अनेक ऐसी परंपराएँ मौजूद हैं, जिनमें स्थानीय जलवायु, कृषि, उपलब्ध संसाधनों और सांस्कृतिक मान्यताओं का प्रभाव दिखाई देता है। एटलस का उद्देश्य इन परंपराओं को दस्तावेजीकृत कर संरक्षित करना तथा नई पीढ़ी और व्यापक समाज तक पहुँचाना है।
कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण ‘An Atlas of Cultural Practices Around Nutrition in Bharat’ का क्षेत्रीय शुभारंभ रहा। यह पहल भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक पोषण ज्ञान को एक मंच पर लाने का प्रयास है। एटलस के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों की स्थानीय खाद्य प्रणालियों, पारंपरिक पोषण संबंधी ज्ञान और सांस्कृतिक प्रथाओं को समझने तथा उन्हें संरक्षित करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. के.के. पंत, निदेशक, IIT रुड़की ने की। अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने कहा कि पोषण, पर्यावरण और सतत विकास एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए विषय हैं। उन्होंने कहा कि स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए वैज्ञानिक प्रगति के साथ-साथ स्थानीय ज्ञान और परंपराओं को समझना भी आवश्यक है। उन्होंने CSRD, RCI-UBA और सहयोगी संस्थाओं द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसी पहलें समाज और अकादमिक जगत के बीच सार्थक संवाद को मजबूत करती हैं।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. चिन्मय पांड्या, अध्यक्ष, गायत्री परिवार, हरिद्वार ने भारतीय परंपरा में प्रकृति, भोजन और जीवनशैली के आपसी संबंध पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रकृति के प्रति सम्मान और संतुलित जीवन का विचार सदियों से मौजूद रहा है। उन्होंने पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक संदर्भों में समझने और युवा पीढ़ी तक पहुँचाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि स्वस्थ व्यक्ति, स्वस्थ समाज और स्वस्थ पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हैं।
कार्यक्रम के अंत में प्रो. बसंत यादव, संयुक्त संकाय, CSRD, IIT रुड़की ने सभी अतिथियों, सहयोगी संस्थाओं, प्रतिभागियों एवं आयोजन से जुड़े सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कार्यक्रम की सफलता में सहयोग देने वाले सभी लोगों को धन्यवाद देते हुए भविष्य में भी सतत ग्रामीण विकास, पोषण जागरूकता और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े प्रयासों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
कार्यक्रम ने पोषण, प्रकृति, संस्कृति और सतत ग्रामीण विकास को एक साझा दृष्टिकोण में जोड़ते हुए स्वस्थ एवं सतत भारत के निर्माण की दिशा में सामूहिक प्रयासों का संदेश दिया।




